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हमारे पड़ौसी गृह - शुक्र और मंगल

आज बात हमारे पड़ौसियों की. अरे नहीं, पड़ौस के शर्मा जी या फिर वर्मा जी की नहीं, बल्कि हमारी पृथ्वी के दो पड़ौसी गृह - मंगल (मार्स) और शुक्र (वीनस) की. आम तौर पर लोगों की बड़ी दिलचस्पी होती हैं अपने पड़ौसी की ज़िन्दगी में. मसलन पड़ौसी की बेटी का रिश्ता क्यों टूट गया या फिर पड़ौसी के बेटे की नौकरी अभी तक क्यों नहीं लगी. ऐसे गैर-ज़रूरती बातों में बड़ा रस आता हैं लोगों को. ये एक इंसानी फितरत हैं या फिर संस्कृति की देन, पर पता नहीं मुझे क्यों ये एक बिमारी जैसा लगता हैं. क्यूँकि मेरी नज़र में ऐसी जानकारी जुटाने से आपको हासिल कुछ भी नहीं होता हैं. ये बात और हैं कि कुछ लोगों के लिए ऐसी बातें समय काटने का एक मात्र ज़रिया होता हैं. मोहल्ले में गपशप बनी रहती हैं. ऐसे लोगों के अलावा हर दौर में चंद इंसान ऐसे भी होते हैं जो कुछ ऐसा करते हैं जिससे कि पूरी इंसानी सभ्यता आगे बढ़ती हैं. मिसाल के तौर पर अमेरिका के एक छोटे से शहर (डेटन) में रहने वाले दो भाईयों ने सीमित संसाधनों से 1903 में पहला हवाई जहाज बनाकर उड़ा दिया. महज़ 100 सालों में हवाई यात्रा जो कभी दो भाईयों का एक सपना थी, आज दुनिया के किसी भी कोने का सफर तय क...