हिमालय के दादा अरावली के पहाड़
बचपन में जब कभी भी मुझे प्रकर्ति को एक चित्र द्वारा दर्शाना होता था, उसमे एक नीले रंग की बहती हुयी नदी और पहाड़ी के पीछे डूबता हुआ सूरज जरूर होते थे. पहाड़ और नदी के बगैर प्रकर्ति की खूबसूरती को एक कागज़ के टुकड़े पर उतारना मेरे लिए मुश्किल होता था. नदी की रफ़्तार और पहाड़ो का ठहराव मेरे चित्रों में जान फूँक दिया करते थे. बचपन राजस्थान के अलवर और जयपुर में बीता, इसलिए अरावली के पहाड़ो को बहुत करीब से देख पाया. सोचा करता था कि कौन हैं जो ये तय करता हैं कि पहाड़ कहाँ होने चाहिए. ऐसा ज़िक्र इतिहास की किताबो में नहीं मिलता कि किसी ताकतवर राजा ने अपनी इच्छा से पहाड़ ही बनवा लिए हो. उन महत्वाकांक्षी राजाओं ने शहरों को तबाह किया और इंसानो तथा उनकी सभ्यताओं को बेहिचक बर्बाद किया, पर पहाड़ो को खड़ा करना तो उनके भी बस की बात नहीं थी. हालांकि खुद को दुश्मन राजाओं से बचाने के लिए अरावली के पहाड़ो का सहारा ज़रूर लिया. उन पर अपने राजमहल बनवाकर. वक़्त के साथ ये तो समझ आने लगा था कि अरावली और हिमालय एक लम्बी ज़िन्दगी तय करके आये हैं और वो समय हमारे निकटतम इतिहास से बहुत पहले का हैं. आइये अरावली और हिमालय की ज़िन्...