आसमां नीला क्यों हैं और दिन में तारे क्यों नहीं दिखते

देखकर अजीब लगता हैं कि लोग अपने चारो तरफ होने वाली सामान्य प्राकर्तिक घटनाओ को ज्यादा तवज्ज़ो नहीं देते. मिसाल के तौर पर - आसमान अपना रंग कैसे बदल लेता हैं - कभी नीला, कभी नारंगी और कभी काला. चाँद का एक ही हिस्सा हमे क्यों दिखाई देता हैं?
कुछ लोग कहेंगे -- हाँ, स्कूल में पढ़ा तो था कि कुछ होता हैं पर अब याद नहीं. यह जग-जाहिर हैं कि स्कूली शिक्षा हमे बस जानकारी मुहैया कराती हैं और जिज्ञासा को मारती चली जाती हैं. यकीन न हो तो 4 - 8 साल के किसी भी बच्चे के साथ रह कर देखिये. उसकी जिज्ञासा सवालों में साफ़ दिखाई पड़ती हैं.
वक़्त के साथ हम प्रकर्ति से जुडी हर बुनियादी जानकारी भूलते चले जाते हैं. यही वजह हैं कि प्रकर्ति से हमारा रिश्ता ख़त्म सा होता जा रहा हैं.

चलो आसमान पर फिर आते हैं. आसमान का रंग नीला क्यों होता हैं? दिल्ली वाले भी अब इस बात से सहमत होंगे क्योंकि लॉकडाउन में नीले आसमान के दर्शन उनको भी हो ही गए. देखिये आसमान का रंग न तो नीला होता हैं, न ही नारंगी और लाल. आसमान का असली रंग तो काला होता हैं जो हमे सूरज के ढलने के बाद दिखाई पड़ता हैं. इस बात से ये तो साफ़ हैं कि सूरज की रोशनी का एक बड़ा योगदान हैं आसमान के नीले और नारंगी दिखने में. जी हाँ. पर पृथ्वी के वायुमंडल की भी अहम् भूमिका हैं. जानते हैं सूरज और पृथ्वी का वायुमंडल कैसे इस काम को अंजाम देते हैं.

जैसे ही सूरज की किरणे लाखों किलोमीटर दूर से पृथ्वी के वायुमंडल, जिसकी ऊंचाई लगभग 500 किलोमीटर हैं, में प्रवेश करती हैं, उसका सामना होता हैं वायुमंडल में मौजूद ऑक्सीजन, नाइट्रोजन (जो सबसे ज्यादा हैं हमारे वायुमंडल में) और धूल के कणों से. धूल के कण अगर देखने हो तो कभी अपनी खिड़की से आने वाली सूरज की किरणों को देख लेना. आराम से दिख जायेंगे. सूरज की किरणों का रंग सफ़ेद होता हैं जिसमे कि सात रंगो का समावेश होता हैं. वो ही सात रंग जो आपको इंद्रधनुष में दिखाई पड़ते हैं. यकीन नहीं होगा पर किरणों के इन रंगो का भी आकार होता हैं - नीली सबसे छोटी और लाल सबसे बड़ी. जैसे ही ये सात रंग वायुमंडल के कणों से टकराते हैं, छोटे आकर वाली नीले रंग की किरणों को दूसरी तरफ धकेल देते हैं. इसलिए नीले रंग की एक चादर सी बन जाती हैं. तो इसका मतलब आसमान का रंग नहीं बदलता हैं, बस यही नीले रंग की अस्थायी चादर हमारे और काले आसमान के बीच में आ जाती हैं.
इसी चादर की वजह से दिन में तारे भी दिखाई नहीं देते हैं. वैसे आमतौर पर लोगों को लगता हैं की सूरज की तेज रोशनी की वजह से होता हैं, जो की सही नहीं हैं.

मेरी आंटी को लगता हैं कि शाम को आसमान का रंग नारंगी-लाल इसलिए दिखाई पड़ता हैं क्यूंकि देवतागण शृंगार कर रहे होते हैं. बहुत ही खूबसूरत नज़ारा होता हैं वैसे. ऐसी बहुत सी मान्यताएं हैं जो विज्ञान से कोसो दूर हैं. सच यह हैं कि सुबह और शाम को सूरज की दूरी दिन के बजाय ज्यादा होती हैं और इसी वजह से नीले रंग की सारी किरणें धकेली जाकर हमारी नज़रो से दूर हो जाती हैं और बड़े आकार की नारंगी और लाल किरणें ही हम तक पहुंच पाती हैं.

हम ऐसी बहुत सी घटनाओं की व्याख्या अपने धर्म, अपनी संस्कृति और समझ के हिसाब से कर सकते हैं पर विज्ञान का जरिया अपने ठोस सिद्धांतो के आधार पर होता हैं. यही कारण हैं कि पुरानी मान्यताएं धूमिल होती जा रही हैं और विज्ञान हमारी समझ को और बेहतर करते जा रहा हैं. बहुत से सवालों के जवाब विज्ञान के पास भी नहीं हैं और हम दूसरे माध्यमों से चीज़ो की व्याख्या करते रहते हैं पर मुझे यकीन हैं   विज्ञान एक न एक दिन सबका जवाब ढून्ढ ही लेगा, बस वक़्त लगेगा.

बस सवाल करते रहिये

सौरभ विजय

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आसमां नीला क्यों हैं और दिन में तारे क्यों नहीं दिखते

Comments

  1. Good ..Informative ..Quite crispy and perfect

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  2. Very well narrated and informative

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  3. Gyaan isi tarah share karte rehna. GYANI" to hum hain aur VIGYANI ban jayenge .

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  4. Very interesting information.. it's causal topics but information is proper high level...Keep it up.. waiting neXt blog

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  5. जानकारी कोई भी दे सकता है, ये कोई बड़ी बात नही है लेकिन एक ही बात को कहने के तरीके से ये पता चल जाता है कि जानकारी देने वाले का उद्देशय क्या है?
    मैं मानता हूं कि लिखावट परफेक्ट हो न हो चलेगा , लेकिन जब उस लिखावट को पढ़ा जाए तब लिखने वाले का चेहरा आँखो के सामने आ जाना चाहिए। ये चीज़ ही लेखक को दूसरों से अलग करती है।
    ऊपर दो पैरों में मैंने दो बात कही है, अब क्यों कही है ,उसको भी स्पष्ट करता हूँ।
    1. आसान भाषा मे लिखना सबसे कठिन होता है, यहाँ पर सही बात को आम भाषा मे कहा गया है, जो हम बचपन से जानते आये है। शायद इसलिए कि लेहमन भी इस बात को समझ सके। मेरी खुद की एक थ्योरी है कि अगर किसी बात लेहमन वाली भाषा मे समझा नही सकते तो उस बात को किसी भी तरीके से समझा नही सकते। भाषा के प्रयोग के लिये पूरे पॉइंट्स।
    2. लेखन में शैली इंसान की पर्सनालिटी की समतुल्य होती है। तुम्हारे हर लेख से मुझे कहीं न कहीं समाज मे फैले दकियानूसी विचारों, गलत मान्यताओं और रीतियो के प्रति तुम्हारी सही सोच नज़र आती है
    ओवर आल मुझे बहुत अच्छा लगा ।कुछ छोटी मोटी ग्रामर की कमी है ,वो लिखते लिखते अपने आप खत्म हो जाती है। मित्र इस चीज को कंटिन्यू रखो।

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