कड़कती हैं बिजली, गरजते और बरसते हैं बादल, पर क्यों?

वैसे तो बारिश की अहमियत का बखान करने की कोई ज़रूरत नहीं हैं. पर दिलचस्प बात ये हैं कि जैसा इंतज़ार बारिश का हमारे देश में होता हैं, वैसा मुझे कहीं और देखने नहीं मिला. बारिश में भीगने का रोमांच शायद ही किसी और देश के लोग उठाते होंगे. सावन की बारिश और जवानी के प्यार के बीच का रिश्ता हमारी फ़िल्मी गानों में बखूबी दिखता हैं. मिसाल के तौर पर " टिप-टिप बरसा पानी, पानी ने आग लगायी". पानी आग लगा दे - ऐसे प्रमाण विज्ञान में तो नहीं मिलते हैं और मैंने भी हमेशा पानी को सिर्फ आग भुजाते देखा हैं, आग लगाते नहीं. शायद कवि ने इन अल्फाज़ो को बुनते हुए अपनी मेहबूब को बारिश में भीगते हुए कल्पना की होगी और अपने रोमांच को दिल में लगने वाली आग में पिरो दिया होगा. प्यार से परे लोग भी बारिश में रोमांचित हो ही जाते हैं. थड़ी पर मिलने वाली गरमा-गरम चाय और तेल में सुलगते समोसे-कचोरी और पकोड़ों को बारिश में नज़र अंदाज़ करना मुश्किल होता हैं.

बारिश का लुत्फ़ उठाते हुए क्या कभी हम सोचते हैं कि बारिश की बूंदे एक सफर तय करके आती हैं हम तक. बादल बनते हैं, गरजते हैं और बरसते हैं और कड़कती हैं बिजली. पर इतना सब होता क्यों हैं. इसमें सूरज का एक बड़ा योगदान हैं. शायद ही कुछ संभव सूरज के बिना हमारी दुनिया में. सूरज की गर्मी से हमारी पृथ्वी पर मौजूद समुद्र, नदियाँ और झीले अपना पानी नमी के रूप में खोते रहते हैं. हमारे पेड़ भी अपनी नमी ऐसे ही गंवाते चलते हैं. यह गर्म नमी हलकी होने के कारण वातावरण में ऊपर उठने लगती हैं. ऊंचाई पर पहुंचकर यह नमी ठंडी हो जाती हैं और पानी की बूंदो से भरे बादल बनना शुरू हो जाते हैं. शुरुआत में ऐसे बादलो में पानी ही कम होता हैं तो फिर बरसेंगे क्या. ऐसे बादल सफ़ेद दिखाई देते हैं. पर जैसे ही नमी की मात्रा हमारी पृथ्वी से ज्यादा पहुंचने लगती हैं, पानी की बूंदे बड़ी भी होने लगती हैं और उनकी संख्या भी बढ़ने लगती हैं. ऐसे घनघौर बादल काले दिखते हैं. ऐसे बादलो में भरी पानी की भारी भरकम बूंदों का वहाँ टिकना मुश्किल हो जाता हैं और हमारी पृथ्वी के मजबूत गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से वो गिरना शुरू हो जाती हैं. ऐसे होती हैं बारिश. वैसे ही जैसे अगर आप अपनी छत से किसी चीज़ को फेंकोगे तो वो नीचे गिरेगी न की ऊपर. तो मतलब अगर पृथ्वी पर अपनी ओर हर चीज़ को खींचने वाला गुरुत्वाकर्षण बल नहीं होता तो बारिश भी नहीं होती. जी हाँ.

पर कुछ बादल सफ़ेद और कुछ काले क्यों दिखते हैं. रंग तो इंसान और गिरगिट को बदलते देखा है बस.
गौर करने वाली बात हैं कि सूरज की रौशनी सफ़ेद होती हैं और सात रंगो से मिलकर बनी होती हैं. वही सात रंग जो इंद्रधनुष में दिखाई देते हैं. पेड़ हमें हरे इसलिए दिखाई देते हैं क्यूंकि उस पर पड़ने वाली सूरज की सफ़ेद रौशनी के 6 रंगो को पेड़ सोंख लेते हैं और सिर्फ हरे रंग की किरणों को ही तितर-बितर करते हैं. वो तीतर बितर होती हरे रंग की किरणें हमारी आँखों पर पड़ती हैं और पेड़ हरे दिखते हैं. दूसरे रंग की चीज़ो के साथ भी ऐसा ही होता हैं, पर सफ़ेद और काला रंग की चीज़ें विशेष हैं. सफ़ेद दिखने वाली चीज़े जैसे कि सफ़ेद बादल सूरज की रौशनी के सातो रंगों को एक साथ धकेल देते हैं और हमारी आँखों पर सातो रंग एक साथ पड़ते हैं. काले बादल रौशनी के सातो रंगो को सोंख लेते हैं और हमारी आँखों पर कोई रंग नहीं पहुंच पाता हैं.

जब बादलो का बनना और बरसना इतनी सहज प्रक्रिया हैं तो फिर उनको गरजने और कड़कने की क्या ज़रूरत ? मेरी दादी अक्सर कहती थी " जो बादल गरजते वो बरसते नहीं", पर मैंने बहुत से गरजते बादलो को बरसते देखा हैं. ये कहावत किसी दार्शनिक की देन रही होगी अंग्रेज़ी की एक समरूप कहावत की तरह "योर एक्शन्स शुड स्पीक लॉउडर दैन वर्ड्स" मतलब आपका काम इतना बड़ा होना चाहिए कि उसको बताने की ज़रूरत ही न हो.

तो होता यूं हैं कि बादलों में भरे पानी के कण खूब उधम मचाये रहते हैं. एक छोटे बच्चे की तरह यहां से वहाँ भाग रहे होते हैं. भागते-भागते टूट जाते हैं. बचपन में छुक-छुक रेलगाड़ी वाला खेल हम सबने खेला हैं, उसमे हर बच्चा अपने आगे वाले बच्चे को पकडे रहता था. एक उत्पाती बच्चे के ज्यादा तेज़ भागने से पूरी रेलगाड़ी दो हिस्से में टूट जाती थी. बिलकुल वैसे ही पानी के कण भी सकारात्मक (+) और नकारात्मक (-) कणों में टूट जाते हैं. (+) कण बादलो के ऊपर वाले हिस्से में इखट्टा होते हैं जबकि (-) नीचे वाले भाग में. एक वक़्त ऐसा आता हैं जब बादल के निचले हिस्से में (-) की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं और उनकी नज़र पृथ्वी के (+) कणों पर पड़ने लगती हैं. आकर्षण बढ़ने लगता हैं पहली नज़र के दूसरे प्यार की तरह और क्षणिक भर में ये कण एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़ते हैं और बिजली पैदा हो जाती हैं. जो चमकती हुयी दिखाई पड़ती हैं वो बिजली ही होती हैं. इतनी बिजली की एक 100 वॉट के बल्ब को 3 महीने तक जला सके. इस बिजली में गर्मी (ऊर्जा) सूरज की सतह के तापमान के लगभग बराबर होती हैं. अब जब ये बिजली हमारे वातावरण से गुजरती हैं तो हवा को बहुत गर्म कर देती हैं और हवा के कणों का आकार एकाएक बढ़ जाता हैं और ढोल की तरह फटने की आवाज आती हैं. जैसे कि मेरे फूफाजी को गर्मी के मौसम में दिमाग में गर्मी बढ़ जाती हैं. गुस्सा अपने चरम पर होता हैं और फटे ढ़ोल की तरह कुछ भी अनाब शनाब बकने लगते हैं. हा हा, इससे बेहतर उदाहरण मुझे मिला नहीं.


सौरभ विजय की कलम से

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Comments

  1. Bahut hi umda.. matlab likhne ka dhang aisa hai ki koi bhi samajh sake. Maja aa gaya padhke...

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  2. बहोत बढ़िए समझाया बड़िया उदारहण के साथ

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  3. Maja aa gya pdkr..well done bhaiya

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