हिमालय के दादा अरावली के पहाड़
बचपन में जब कभी भी मुझे प्रकर्ति को एक चित्र द्वारा दर्शाना होता था, उसमे एक नीले रंग की बहती हुयी नदी और पहाड़ी के पीछे डूबता हुआ सूरज जरूर होते थे. पहाड़ और नदी के बगैर प्रकर्ति की खूबसूरती को एक कागज़ के टुकड़े पर उतारना मेरे लिए मुश्किल होता था. नदी की रफ़्तार और पहाड़ो का ठहराव मेरे चित्रों में जान फूँक दिया करते थे.
बचपन राजस्थान के अलवर और जयपुर में बीता, इसलिए अरावली के पहाड़ो को बहुत करीब से देख पाया. सोचा करता था कि कौन हैं जो ये तय करता हैं कि पहाड़ कहाँ होने चाहिए. ऐसा ज़िक्र इतिहास की किताबो में नहीं मिलता कि किसी ताकतवर राजा ने अपनी इच्छा से पहाड़ ही बनवा लिए हो. उन महत्वाकांक्षी राजाओं ने शहरों को तबाह किया और इंसानो तथा उनकी सभ्यताओं को बेहिचक बर्बाद किया, पर पहाड़ो को खड़ा करना तो उनके भी बस की बात नहीं थी. हालांकि खुद को दुश्मन राजाओं से बचाने के लिए अरावली के पहाड़ो का सहारा ज़रूर लिया. उन पर अपने राजमहल बनवाकर. वक़्त के साथ ये तो समझ आने लगा था कि अरावली और हिमालय एक लम्बी ज़िन्दगी तय करके आये हैं और वो समय हमारे निकटतम इतिहास से बहुत पहले का हैं.
आइये अरावली और हिमालय की ज़िन्दगियों को विज्ञान के ज़रिये टटोलते हैं. पृथ्वी की उम्र लगभग 450 करोड़ साल हैं और इन सालो में हमारी पृथ्वी ने बहुत कुछ देखा हैं. कभी एक आग के गोले की तरह धधकती रही तो कभी बर्फ की चादर से खुद को ढक लिया. 250 करोड़ से 54 करोड़ साल पहले का एक दौर था जब भारत अफ्रीका महाद्वीप का हिस्सा था. ये वो दौर था जब इंसान नहीं थे तो जाहिर सी बात हैं सरहदे भी नहीं थी. उस दौर में अरावली के पहाड़ बने. पर पहाड़ आखिर बनते कैसे हैं? पृथ्वी एक चलायमान तंत्र हैं और इसके बहुत से हिस्से बिना रुके निरंतर खिसकते ही रहते हैं. जब कभी पृथ्वी के दो भू-भाग एक दूसरे से टकराते हैं तो टकराने वाली जगह ऊपर उठने लगती हैं. समझने के लिए एक कागज़ के टुकड़े को किसी मेज पर रखिये और उसके दो विपरीत सिरों को एक दूसरे की तरफ धकेलिए, बीच का हिस्सा उठ जायेगा. तो हुआ यूं कि उस दौर में अफ्रीका महाद्वीप से जुड़े भारत के अरावली के आस पास वाले हिस्से खिसक रहे थे. साल दर साल 200 करोड़ साल तक. जितना ज़्यादा भू-भाग खिसकते उतनी ही ऊंचाई बढ़ जाती अरावली के पहाड़ो की. और फिर एक दिन अरावली के आस-पास के हिस्से ने खिसकना बंद कर दिया. तो अरावली की शृंखला बनने का जो सिलसिला 250 करोड़ साल पहले शुरू हुआ था वो लगभग 54 करोड़ साल पहले ख़त्म हुआ.
तकरीबन 35 करोड़ साल पहले हमारे भारत देश का भू-भाग अफ्रीका महाद्वीप से टूट कर अलग हो गया. और फिर 30 करोड़ साल का लम्बा सफर हिन्द महासागर के रास्ते तय करते हुए 5 करोड़ साल पहले हमारा देश भारत का भू-भाग चीन के भू-भाग से टकरा गया और हिमालय का जन्म हुआ. पिछले 5 करोड़ साल में यह हिस्सा साल दर साल खिसकता रहा हैं और माउंट एवेरेस्ट जैसी कई चोटियां बनती रही हैं. मिसाल के तौर पर आज के दिन माउंट एवेरेस्ट की समुद्र तल से ऊंचाई 8848 मीटर हैं और इसकी ऊंचाई हर साल 4 मिली-मीटर बढ़ती जा रही हैं. इसका मतलब 1000 साल बाद इसकी ऊंचाई 4 मीटर बढ़कर 8852 मीटर हो जायेगी. हिमालय की इन्ही ऊंचाइयों की वजह से ही वहाँ बर्फ़बारी होती रही हैं और ग्लेशियर (बर्फीली नदी) बनते चले गए हैं. गंगा जैसी जीवनदायक नदी भी हिमालय के ग्लेशियर की ही देन हैं. तो मतलब भारत का हिस्सा अफ्रीका से न टूटता तो न हिमालय बनते और न वहाँ से गंगा और बाकी की नदियाँ निकल पाती और आज हमारा देश उतना उपजाऊ नहीं होता. लेकिन वो न होता तो फिर कुछ और होता.
गौर करने वाली बात ये हैं कि हिमालय बनने का काम 5 करोड़ साल से अभी तक चल रहा हैं और अरावली के पहाड़ बनने का काम 54 करोड़ साल पहले ही रुक चुका हैं. अगर पहाड़ो के बनने के समय को इंसान की उम्र में बदल दिया जाए तो अरावली के पहाड़ो की उम्र होगी 100 बरस और हिमालय की 10 बरस. इसलिए अरावली के पहाड़ को हिमालय का दादा भी कहा जा सकता हैं. एक बुज़ुर्ग दादा की तरह अरावली के पहाड़ो की सेहत भी गिर रही हैं. वो घिस रहे हैं. जिससे कि उनकी ऊंचाई कम हो रही हैं. बहती हवा की वजह से ऐसा हो रहा हैं. ये मुमकिन हैं कि आने वाले 50 करोड़ सालो में वह घिस कर काफी हद तक ख़त्म हो जाए. पर ज़्यादा मुमकिन ये भी हैं कि इंसान अपनी बेइन्ताह जरुरतो के लिए अरावली के पहाड़ो को तोड़कर बिलकुल ही ख़त्म कर दे. मेरी बात पर यकीन न हो तो जिस संगमरमर की फर्श पर आप खड़े हैं और जो ग्रेनाइट का पत्थर आपकी रसोई की पट्टी पर लगा हैं, संभव हैं कि वो अरावली के पहाड़ो का काटकर ही आपके घर तक पंहुचा हो. एक बात और, कुछ वैज्ञानिको का मानना हैं कि अगर अरावली शृंखला न होती तो पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान दिल्ली तक होते. क्या कभी हम अरावली को देखकर उसकी अहमियत को समझ पाते हैं. अगर नहीं तो देखना चाहिए.
~ सौरभ विजय
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कड़कती हैं बिजली, गरजते और बरसते हैं बादल, पर क्यों?
हिमालय के दादा अरावली के पहाड़
आसमां नीला क्यों हैं और दिन में तारे क्यों नहीं दिखते
बचपन राजस्थान के अलवर और जयपुर में बीता, इसलिए अरावली के पहाड़ो को बहुत करीब से देख पाया. सोचा करता था कि कौन हैं जो ये तय करता हैं कि पहाड़ कहाँ होने चाहिए. ऐसा ज़िक्र इतिहास की किताबो में नहीं मिलता कि किसी ताकतवर राजा ने अपनी इच्छा से पहाड़ ही बनवा लिए हो. उन महत्वाकांक्षी राजाओं ने शहरों को तबाह किया और इंसानो तथा उनकी सभ्यताओं को बेहिचक बर्बाद किया, पर पहाड़ो को खड़ा करना तो उनके भी बस की बात नहीं थी. हालांकि खुद को दुश्मन राजाओं से बचाने के लिए अरावली के पहाड़ो का सहारा ज़रूर लिया. उन पर अपने राजमहल बनवाकर. वक़्त के साथ ये तो समझ आने लगा था कि अरावली और हिमालय एक लम्बी ज़िन्दगी तय करके आये हैं और वो समय हमारे निकटतम इतिहास से बहुत पहले का हैं.
आइये अरावली और हिमालय की ज़िन्दगियों को विज्ञान के ज़रिये टटोलते हैं. पृथ्वी की उम्र लगभग 450 करोड़ साल हैं और इन सालो में हमारी पृथ्वी ने बहुत कुछ देखा हैं. कभी एक आग के गोले की तरह धधकती रही तो कभी बर्फ की चादर से खुद को ढक लिया. 250 करोड़ से 54 करोड़ साल पहले का एक दौर था जब भारत अफ्रीका महाद्वीप का हिस्सा था. ये वो दौर था जब इंसान नहीं थे तो जाहिर सी बात हैं सरहदे भी नहीं थी. उस दौर में अरावली के पहाड़ बने. पर पहाड़ आखिर बनते कैसे हैं? पृथ्वी एक चलायमान तंत्र हैं और इसके बहुत से हिस्से बिना रुके निरंतर खिसकते ही रहते हैं. जब कभी पृथ्वी के दो भू-भाग एक दूसरे से टकराते हैं तो टकराने वाली जगह ऊपर उठने लगती हैं. समझने के लिए एक कागज़ के टुकड़े को किसी मेज पर रखिये और उसके दो विपरीत सिरों को एक दूसरे की तरफ धकेलिए, बीच का हिस्सा उठ जायेगा. तो हुआ यूं कि उस दौर में अफ्रीका महाद्वीप से जुड़े भारत के अरावली के आस पास वाले हिस्से खिसक रहे थे. साल दर साल 200 करोड़ साल तक. जितना ज़्यादा भू-भाग खिसकते उतनी ही ऊंचाई बढ़ जाती अरावली के पहाड़ो की. और फिर एक दिन अरावली के आस-पास के हिस्से ने खिसकना बंद कर दिया. तो अरावली की शृंखला बनने का जो सिलसिला 250 करोड़ साल पहले शुरू हुआ था वो लगभग 54 करोड़ साल पहले ख़त्म हुआ.
तकरीबन 35 करोड़ साल पहले हमारे भारत देश का भू-भाग अफ्रीका महाद्वीप से टूट कर अलग हो गया. और फिर 30 करोड़ साल का लम्बा सफर हिन्द महासागर के रास्ते तय करते हुए 5 करोड़ साल पहले हमारा देश भारत का भू-भाग चीन के भू-भाग से टकरा गया और हिमालय का जन्म हुआ. पिछले 5 करोड़ साल में यह हिस्सा साल दर साल खिसकता रहा हैं और माउंट एवेरेस्ट जैसी कई चोटियां बनती रही हैं. मिसाल के तौर पर आज के दिन माउंट एवेरेस्ट की समुद्र तल से ऊंचाई 8848 मीटर हैं और इसकी ऊंचाई हर साल 4 मिली-मीटर बढ़ती जा रही हैं. इसका मतलब 1000 साल बाद इसकी ऊंचाई 4 मीटर बढ़कर 8852 मीटर हो जायेगी. हिमालय की इन्ही ऊंचाइयों की वजह से ही वहाँ बर्फ़बारी होती रही हैं और ग्लेशियर (बर्फीली नदी) बनते चले गए हैं. गंगा जैसी जीवनदायक नदी भी हिमालय के ग्लेशियर की ही देन हैं. तो मतलब भारत का हिस्सा अफ्रीका से न टूटता तो न हिमालय बनते और न वहाँ से गंगा और बाकी की नदियाँ निकल पाती और आज हमारा देश उतना उपजाऊ नहीं होता. लेकिन वो न होता तो फिर कुछ और होता.
गौर करने वाली बात ये हैं कि हिमालय बनने का काम 5 करोड़ साल से अभी तक चल रहा हैं और अरावली के पहाड़ बनने का काम 54 करोड़ साल पहले ही रुक चुका हैं. अगर पहाड़ो के बनने के समय को इंसान की उम्र में बदल दिया जाए तो अरावली के पहाड़ो की उम्र होगी 100 बरस और हिमालय की 10 बरस. इसलिए अरावली के पहाड़ को हिमालय का दादा भी कहा जा सकता हैं. एक बुज़ुर्ग दादा की तरह अरावली के पहाड़ो की सेहत भी गिर रही हैं. वो घिस रहे हैं. जिससे कि उनकी ऊंचाई कम हो रही हैं. बहती हवा की वजह से ऐसा हो रहा हैं. ये मुमकिन हैं कि आने वाले 50 करोड़ सालो में वह घिस कर काफी हद तक ख़त्म हो जाए. पर ज़्यादा मुमकिन ये भी हैं कि इंसान अपनी बेइन्ताह जरुरतो के लिए अरावली के पहाड़ो को तोड़कर बिलकुल ही ख़त्म कर दे. मेरी बात पर यकीन न हो तो जिस संगमरमर की फर्श पर आप खड़े हैं और जो ग्रेनाइट का पत्थर आपकी रसोई की पट्टी पर लगा हैं, संभव हैं कि वो अरावली के पहाड़ो का काटकर ही आपके घर तक पंहुचा हो. एक बात और, कुछ वैज्ञानिको का मानना हैं कि अगर अरावली शृंखला न होती तो पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान दिल्ली तक होते. क्या कभी हम अरावली को देखकर उसकी अहमियत को समझ पाते हैं. अगर नहीं तो देखना चाहिए.
~ सौरभ विजय
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कड़कती हैं बिजली, गरजते और बरसते हैं बादल, पर क्यों?
हिमालय के दादा अरावली के पहाड़
आसमां नीला क्यों हैं और दिन में तारे क्यों नहीं दिखते
Nice one dear Saurabh..
ReplyDeleteAravali mountain range is longest range of india. It is 800 km long. Per hum insaan sab kuch khaarb kar ke hi manenge.
ReplyDeleteVery well written 👍
ReplyDeleteYou write like a history or science book writer. I always find very deep meaning of science and human behaviour in your blogs. Keep writing Saurabh.
ReplyDeleteVery informative thanks for sharing
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteGood Information with very nice narration.
ReplyDeleteIt's a really good one! The way you write and make it simpler for the reader and even a layman can understand what you write! Keep writing!
ReplyDeleteVery nicely written
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