दूसरी दुनिया की तलाश में हम
ये और बात हैं कि अक्सर लोग "दुनिया" शब्द का इस्तेमाल अपने असीम और सर्वस्व भाव को दर्शाने के लिए करते हैं. मिसाल के तौर पर घर के बड़े-बुज़ुर्ग अक्सर कहते रहते हैं कि "हमने बहुत दुनिया देखी हैं", जबकि उनमें से ज्यादातर लोगों ने कभी अपने शहर से बाहर भी कदम नहीं रखा होता हैं. 17 की उम्र में जिससे दिल लगाया, वो भी आये दिन बस यही कहती रहती थी कि मैं ही उसकी दुनिया हूँ.
"दुनिया" शब्द को लेकर मेरी सही समझ स्कूली शिक्षा के दौरान बनी. भूगोल की किताब के रंगबिरंगी पन्नों में गढ़ी भौतिक दुनिया. सात महाद्वीपों और पांच विशालकाय समुद्रों से मिलकर बनी दुनिया. वो दुनिया जहाँ इंसानों के हज़ारों सालों का सफर साफ़ दिखाई देता हैं. वो दुनिया जहां इंसानो ने लकीरें बनाई हुयी हैं और आये दिन इसी बात पर झगड़ते रहते हैं. इस दुनिया में भाषाएँ भी बदलती हुई संस्कृतियों के साथ खुद के स्वरुप को बदलती रही हैं. यहां धर्मों ने समाज को एक साथ पिरोया हैं पर समय-समय पर उसको बांटने का कारण भी बना हैं. इस विशाल और विविध दुनिया के किसी भी पहलू के बारे में जब भी पढ़ा और जाना, तो इसको और इससे जुड़े मेरे अस्तित्व की समझ कुछ ज्यादा बेहतर बनती चली गई. एक रिश्ता हैं मेरा इस दुनिया से और इससे जुडी हर चीज़ से. ऐसा लगता हैं जो भी बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा घट रहा हैं मेरे आसपास, वो सब मेरे लिए ही हैं. जैसे मैं सांस ले सकू इसलिए ही पेड़ सांस छोड़ रहे हैं. रोज़ाना दिखने वाले सूरज, चाँद और तारों को भी मैं अपनी ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा मानता हूँ.
इस दुनिया के बाहर क्या हैं, वो तब तक मेरी कल्पनाओं से परे रहा जब तक मेरा वास्ता "ब्रह्मांड" शब्द से नहीं पड़ा. इस बात का इल्म तो था कि पृथ्वी की तरह सात और गृह हैं जो सूरज के चारो और चक्कर लगाते हैं. इस नए शब्द के पहचान के साथ ही मेरी सीमित दुनिया के सिरे बढ़ने लगे. हमारी नज़र और सोच से कहीं दूर तक फैले हुए ब्रह्मांड और उससे जुडी हुई बातों ने मेरी जिज्ञासा को एक नया जीवन दिया. बताने की ज़रूरत नहीं पर स्कूली शिक्षा और घरों का आम माहौल बचपन में ही हमारी जिज्ञासा का गला घोंट देते हैं. सवाल करना जिज्ञासा को दर्शाते हैं और बच्चे स्वाभाविक तौर पर जिज्ञासु ही होते हैं तथा आस-पास घटने वाले हर विषय पर दिलचस्पी रखते हैं. गाय की जुगाली से हवाई-जहाज के उड़ने तक हर बात पर वो एक समान रूचि रखते हैं. कुछ माँ-बाप अपने बच्चों के सवालों के पिटारे से तंग आ जाते हैं. ऐसे में एक वक़्त के बाद बच्चों को लगने लगता हैं कि सवाल करना अच्छी बात नहीं हैं. स्कूल में भी सवालों का दायरा सीमित रखना पड़ता हैं और अपनी कल्पनाओ और जिज्ञासा से पनपे सवालों को कहीं भी जगह नहीं मिल पाती.
मेरी जिज्ञासा का पुनर्जन्म हुआ और मैं ब्रह्मांड से जुड़े ज्ञान की राह पर चल पड़ा. धीरे-धीरे पता चला कि ऐसे असंख्य सौर-मंडल हैं इस ब्रह्माण्ड में. मतलब असंख्य सूरज और उनके चारो तरफ चक्कर लगाने वाले अनगिनत गृह. इससे ये भ्रम टूटा कि सूरज देवता सम्पूर्ण ब्रह्मांड के नहीं, सिर्फ पृथ्वी के ही हैं. भ्रम टूटते गए और जिज्ञासा बढ़ती चली गयी. एक जिज्ञासा जो हम सब में हैं कि क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं या किसी और गृह पर भी जीवन हैं? जवाब कुछ भी हो, दोनों ही परिस्तिथियों के बारे में कल्पना करके एक सनसनी सी पैदा हो जाती हैं. शायद इसलिए ही दुनिया के सबसे बड़े अंतरिक्ष संस्थानों ने बहुत से ऐसे कदम उठाये हैं जिससे हम इस बात का पता लगा सके. जैसे कि दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष संस्थान नासा ने 1977 में वॉयजर नाम का एक यान अंतरिक्ष में छोड़ा. उस यान में पृथ्वी की कुछ आवाज़े रिकॉर्ड करके भेजी गई - जैसे कि जानवरो की आवाज़े, बच्चे के रोने की आवाज़े, लहरों के तट से टकराने की आवाज़े, अमेरिका के राष्ट्रपति का एक सन्देश और बहुत सी अलग प्रकार की आवाज़ें. उन्होंने सोचा कि अगर कोई उनको सुन लेगा तो क्या पता हमे खोजता हुआ हम तक पहुंच जाए. पिछले 48 सालो से ऐसे दो यान अंतरिक्ष में एक दिशा में चले ही जा रहे हैं और पृथ्वी पर सन्देश भेजते रहते हैं. अभी तक तो कोई मिला नहीं पर क्या पता उड़नतश्तरी (UFO), जो कि आम तौर पर बहुत बार देखी गयी हैं, पर दूसरे गृह के लोग हमारी ज़िन्दगी में झाँकने आते रहते हों. पर संपर्क अभी तक क्यों नहीं किया, क्या पता? नासा ने एक बहुत बड़े दूरबीन, टीइएसएस, को भी अंतरिक्ष में छोड़ा हैं जो दूसरे ग्रहों की ओर झांकता रहता हैं और तस्वीरें भेजते रहता हैं जिनके ज़रिये हम वो गृह ढून्ढ पा रहे हैं जहां पर जीवन संभव हैं. हाल ही में इस मिशन ने एक गृह को खोजा (टी ओ ई 700 डी) जो अपने सूरज से उतनी ही दूरी पर हैं जितना कि पृथ्वी अपने सूरज से हैं. ऐसे में वहाँ पानी हो सकता हैं जो कि हमारे जैसे जीवन के लिए सबसे जरुरी हैं.
पड़ौसियों की ज़िन्दगियों में हमे हमेशा दिलचस्पी रहती हैं. अपने घर के बच्चे चाहे आपकी एक न सुनते हों, पर पड़ौसी के लड़के की नौकरी लगी कि नहीं या उसकी लड़की की शादी अभी तक क्यों नहीं हुई - इन बातों में दिलचस्पी जरूर रहती हैं. ऐसे ही पृथ्वी के दो पड़ौसी गृह हैं - शुक्र और मंगल. इतने पास कि शुक्र को खुली आँखों से एक चमकते तारे की तरह हर सुबह 4-5 बजे के आसपास देखा जा सकता हैं. जबकि मंगल गृह को हर दो साल में गर्मियों की हर एक शाम को डूबते सूरज के वक़्त देख सकते हैं. एक अमेरिकी कंपनी स्पेसएक्स ने वादा किया हैं कि 2030 तक वो मंगल गृह पर एक इंसानो के रहने वाली कॉलोनी बना लेगी जहां वैज्ञानिको का एक समूह रहेगा और मंगल गृह के बहुत से पहलुओं पर खोज करेगा, जिसके कि पृथ्वी के और इससे बाहर के जीवन पर हमारी समझ बढ़ेगी. नासा की तरह भारतीय अंतरिक्ष संस्थान इसरो ने भी 2013 ने मंगलयान छोड़ा था और मंगल गृह के सतह की बहुत सी तस्वीरें ली थी. ऐसी तस्वीरो से पता चलता हैं कि मंगल पर कभी नदियाँ हुआ करती थी. नासा ने एक छः पहिये वाली गाडी मंगल गृह पर भेजी हुई हैं और उसने मंगल की सतह को खोदकर पता लगाया कि वहाँ बर्फ ही बर्फ हैं. ऐसा मानना हैं कि अगर हम किसी तरह वो बर्फ पिघला दे और सूरज की पहुंच तो मंगल पर हैं ही. सूरज और पानी से तो जीवन शुरू हो ही सकता हैं. जितना आसान यह सुनने में लगता हैं, उतना हैं नहीं पर मुमकिन हैं और वैज्ञानिक इसी दिशा में काम करने में लगे हैं. ऐसे पृथ्वी समान बहुत से गृह होंगे.
कुछ वैज्ञानिक बुद्धिजीवियो का मानना हैं कि हमे जल्द से जल्द दूसरे गृह पर इंसानी सभ्यता को स्थापित करना चाहिए. मेरे दोस्त चिराग की तरह अगर आप भी ऐसा सोचते हैं कि पृथ्वी पर तो इंसान का रहना कितना मुश्किल हो रहा हैं, जलवायु परिवर्तन से आये दिन तबाही का मंज़र रहता हैं और चले हैं दूसरी दुनिया बसाने. ये सवाल जायज़ हैं पर सोचिये एक भी भारी उल्कापिंड अगर पृथ्वी से टकराता हैं तो इंसानी सभ्यता पूरी तरह नष्ट हो सकती हैं और जीवन की सारी संभावनाएं भी आने वाले लाखों सालो तक ख़त्म हो सकती हैं. ऐसा पहले भी बहुत बार हुआ हैं. कुछ वैज्ञानिक सबूत ये दर्शाते हैं कि अंतरिक्ष से आने वाले उल्कापिंड की वजह से ही एकाएक डायनासोर, जो एक वक़्त पूरी दुनिया में बसा करते थे, लुप्त हो गए. और उनके विलुप्त होने के 6.5 करोड़ साल बाद भी उनकी प्रजाति आज तक भी अस्तित्व में नहीं आ पायी हैं. ऐसा कभी भी हो सकता हैं और उससे बचने के लिए हमारे पास कोई संसाधन भी नहीं हैं. हमे आपस में लड़ने से फुर्सत मिले तो शायद हम अंतरिक्ष से आने वाली किसी भी विपदा का सामना कर पाएंगे. सोचकर भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो हमारी हज़ारो सालो की मेहनत से बटोरा गया वैज्ञानिक ज्ञान भी नष्ट हो सकता हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए.
दूसरे दिलचस्प ब्लॉग पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें.
कड़कती हैं बिजली, गरजते और बरसते हैं बादल, पर क्यों?
हिमालय के दादा अरावली के पहाड़
आसमां नीला क्यों हैं और दिन में तारे क्यों नहीं दिखते
दूसरी दुनिया की तलाश में हम
"दुनिया" शब्द को लेकर मेरी सही समझ स्कूली शिक्षा के दौरान बनी. भूगोल की किताब के रंगबिरंगी पन्नों में गढ़ी भौतिक दुनिया. सात महाद्वीपों और पांच विशालकाय समुद्रों से मिलकर बनी दुनिया. वो दुनिया जहाँ इंसानों के हज़ारों सालों का सफर साफ़ दिखाई देता हैं. वो दुनिया जहां इंसानो ने लकीरें बनाई हुयी हैं और आये दिन इसी बात पर झगड़ते रहते हैं. इस दुनिया में भाषाएँ भी बदलती हुई संस्कृतियों के साथ खुद के स्वरुप को बदलती रही हैं. यहां धर्मों ने समाज को एक साथ पिरोया हैं पर समय-समय पर उसको बांटने का कारण भी बना हैं. इस विशाल और विविध दुनिया के किसी भी पहलू के बारे में जब भी पढ़ा और जाना, तो इसको और इससे जुड़े मेरे अस्तित्व की समझ कुछ ज्यादा बेहतर बनती चली गई. एक रिश्ता हैं मेरा इस दुनिया से और इससे जुडी हर चीज़ से. ऐसा लगता हैं जो भी बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा घट रहा हैं मेरे आसपास, वो सब मेरे लिए ही हैं. जैसे मैं सांस ले सकू इसलिए ही पेड़ सांस छोड़ रहे हैं. रोज़ाना दिखने वाले सूरज, चाँद और तारों को भी मैं अपनी ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा मानता हूँ.
इस दुनिया के बाहर क्या हैं, वो तब तक मेरी कल्पनाओं से परे रहा जब तक मेरा वास्ता "ब्रह्मांड" शब्द से नहीं पड़ा. इस बात का इल्म तो था कि पृथ्वी की तरह सात और गृह हैं जो सूरज के चारो और चक्कर लगाते हैं. इस नए शब्द के पहचान के साथ ही मेरी सीमित दुनिया के सिरे बढ़ने लगे. हमारी नज़र और सोच से कहीं दूर तक फैले हुए ब्रह्मांड और उससे जुडी हुई बातों ने मेरी जिज्ञासा को एक नया जीवन दिया. बताने की ज़रूरत नहीं पर स्कूली शिक्षा और घरों का आम माहौल बचपन में ही हमारी जिज्ञासा का गला घोंट देते हैं. सवाल करना जिज्ञासा को दर्शाते हैं और बच्चे स्वाभाविक तौर पर जिज्ञासु ही होते हैं तथा आस-पास घटने वाले हर विषय पर दिलचस्पी रखते हैं. गाय की जुगाली से हवाई-जहाज के उड़ने तक हर बात पर वो एक समान रूचि रखते हैं. कुछ माँ-बाप अपने बच्चों के सवालों के पिटारे से तंग आ जाते हैं. ऐसे में एक वक़्त के बाद बच्चों को लगने लगता हैं कि सवाल करना अच्छी बात नहीं हैं. स्कूल में भी सवालों का दायरा सीमित रखना पड़ता हैं और अपनी कल्पनाओ और जिज्ञासा से पनपे सवालों को कहीं भी जगह नहीं मिल पाती.
मेरी जिज्ञासा का पुनर्जन्म हुआ और मैं ब्रह्मांड से जुड़े ज्ञान की राह पर चल पड़ा. धीरे-धीरे पता चला कि ऐसे असंख्य सौर-मंडल हैं इस ब्रह्माण्ड में. मतलब असंख्य सूरज और उनके चारो तरफ चक्कर लगाने वाले अनगिनत गृह. इससे ये भ्रम टूटा कि सूरज देवता सम्पूर्ण ब्रह्मांड के नहीं, सिर्फ पृथ्वी के ही हैं. भ्रम टूटते गए और जिज्ञासा बढ़ती चली गयी. एक जिज्ञासा जो हम सब में हैं कि क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं या किसी और गृह पर भी जीवन हैं? जवाब कुछ भी हो, दोनों ही परिस्तिथियों के बारे में कल्पना करके एक सनसनी सी पैदा हो जाती हैं. शायद इसलिए ही दुनिया के सबसे बड़े अंतरिक्ष संस्थानों ने बहुत से ऐसे कदम उठाये हैं जिससे हम इस बात का पता लगा सके. जैसे कि दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष संस्थान नासा ने 1977 में वॉयजर नाम का एक यान अंतरिक्ष में छोड़ा. उस यान में पृथ्वी की कुछ आवाज़े रिकॉर्ड करके भेजी गई - जैसे कि जानवरो की आवाज़े, बच्चे के रोने की आवाज़े, लहरों के तट से टकराने की आवाज़े, अमेरिका के राष्ट्रपति का एक सन्देश और बहुत सी अलग प्रकार की आवाज़ें. उन्होंने सोचा कि अगर कोई उनको सुन लेगा तो क्या पता हमे खोजता हुआ हम तक पहुंच जाए. पिछले 48 सालो से ऐसे दो यान अंतरिक्ष में एक दिशा में चले ही जा रहे हैं और पृथ्वी पर सन्देश भेजते रहते हैं. अभी तक तो कोई मिला नहीं पर क्या पता उड़नतश्तरी (UFO), जो कि आम तौर पर बहुत बार देखी गयी हैं, पर दूसरे गृह के लोग हमारी ज़िन्दगी में झाँकने आते रहते हों. पर संपर्क अभी तक क्यों नहीं किया, क्या पता? नासा ने एक बहुत बड़े दूरबीन, टीइएसएस, को भी अंतरिक्ष में छोड़ा हैं जो दूसरे ग्रहों की ओर झांकता रहता हैं और तस्वीरें भेजते रहता हैं जिनके ज़रिये हम वो गृह ढून्ढ पा रहे हैं जहां पर जीवन संभव हैं. हाल ही में इस मिशन ने एक गृह को खोजा (टी ओ ई 700 डी) जो अपने सूरज से उतनी ही दूरी पर हैं जितना कि पृथ्वी अपने सूरज से हैं. ऐसे में वहाँ पानी हो सकता हैं जो कि हमारे जैसे जीवन के लिए सबसे जरुरी हैं.
पड़ौसियों की ज़िन्दगियों में हमे हमेशा दिलचस्पी रहती हैं. अपने घर के बच्चे चाहे आपकी एक न सुनते हों, पर पड़ौसी के लड़के की नौकरी लगी कि नहीं या उसकी लड़की की शादी अभी तक क्यों नहीं हुई - इन बातों में दिलचस्पी जरूर रहती हैं. ऐसे ही पृथ्वी के दो पड़ौसी गृह हैं - शुक्र और मंगल. इतने पास कि शुक्र को खुली आँखों से एक चमकते तारे की तरह हर सुबह 4-5 बजे के आसपास देखा जा सकता हैं. जबकि मंगल गृह को हर दो साल में गर्मियों की हर एक शाम को डूबते सूरज के वक़्त देख सकते हैं. एक अमेरिकी कंपनी स्पेसएक्स ने वादा किया हैं कि 2030 तक वो मंगल गृह पर एक इंसानो के रहने वाली कॉलोनी बना लेगी जहां वैज्ञानिको का एक समूह रहेगा और मंगल गृह के बहुत से पहलुओं पर खोज करेगा, जिसके कि पृथ्वी के और इससे बाहर के जीवन पर हमारी समझ बढ़ेगी. नासा की तरह भारतीय अंतरिक्ष संस्थान इसरो ने भी 2013 ने मंगलयान छोड़ा था और मंगल गृह के सतह की बहुत सी तस्वीरें ली थी. ऐसी तस्वीरो से पता चलता हैं कि मंगल पर कभी नदियाँ हुआ करती थी. नासा ने एक छः पहिये वाली गाडी मंगल गृह पर भेजी हुई हैं और उसने मंगल की सतह को खोदकर पता लगाया कि वहाँ बर्फ ही बर्फ हैं. ऐसा मानना हैं कि अगर हम किसी तरह वो बर्फ पिघला दे और सूरज की पहुंच तो मंगल पर हैं ही. सूरज और पानी से तो जीवन शुरू हो ही सकता हैं. जितना आसान यह सुनने में लगता हैं, उतना हैं नहीं पर मुमकिन हैं और वैज्ञानिक इसी दिशा में काम करने में लगे हैं. ऐसे पृथ्वी समान बहुत से गृह होंगे.
![]() |
| दूसरे दुनिया की तरफ झांकता एक इंसान. सुयश रस्तोगी के सौजन्य से. |
सौरभ विजय की कलम से
दूसरे दिलचस्प ब्लॉग पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें.
कड़कती हैं बिजली, गरजते और बरसते हैं बादल, पर क्यों?
हिमालय के दादा अरावली के पहाड़
आसमां नीला क्यों हैं और दिन में तारे क्यों नहीं दिखते
दूसरी दुनिया की तलाश में हम

Very informative.. Amazing 😊
ReplyDeleteInteresting....n easy to understand..keep giving us such informations👍👍
ReplyDeleteGood read.. could easily relate..
ReplyDeleteAs always well written and good content. I like your writing style.
ReplyDeleteNice narration.
ReplyDeleteWell written with scientific facts. I enjoyed reading.
ReplyDeleteWriting skills of you is simply superb . How with so much ease you give us a good knowledge ? I m really impressed mama and learn a lot from that.
ReplyDeleteContent of knowledge is I never thought of in this direction but now you created curiosity to get more on this.
Simply loved it ❤️.keep writing