पानी की कहानी

 पानी - एक छोटा सा शब्द पर हमारे और हमारे ग्रह पृथ्वी पर जीवन की सभी संभावनाओं की बुनियादी ज़रूरत. वो पानी ही हैं जिसके लिए आसमान में उड़ते हुए पक्षी ज़मीन की तरफ रुख करते हैं. वो पानी ही हैं जिसको अपनी सूंड में भरकर हाथी भी मदमस्त हो जाता हैं. रेगिस्तान का जहाज भी ऊँट को इसलिए ही कहा जाता हैं क्यूंकि उसमे जीवनदायनी पानी को लम्बे समय तक संचय करने की क्षमता होती हैं. हालांकि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हम सब में से बहुत लोग पानी की अहमियत को नहीं समझ पाते. ऐसा इसलिए होता हैं क्यूंकि पानी बड़ी आसानी से हमारे पास उपलब्ध हैं. पर जैसे ही पानी ज़िन्दगी से कुछ वक़्त के लिए भी ओझल हो जाए, तो हमारे होश तुरंत ही ठिकाने पर आ जाते हैं. एक बार मौसाजी अपने भरे-पूरे परिवार के साथ हमारे घर पर आने वाले थे. 1 हफ्ते रुकने का प्लान था. सामान से भरी अटेची लग चुकी थी और ऍन वक़्त पर माँ ने उनको फ़ोन करके जैसे ही बताया कि बोरवेल में पानी नहीं हैं और किल्लत हो गयी हैं. ये सुनकर उन्होंने हमारे यहां आने का कार्यक्रम पूरे साल भर के लिए टाल दिया. पानी एक बिन बुलाये मेहमान तक को लौटा सकता हैं. ऐसी ताकत और किसी चीज़ में नहीं. 

पानी से हमारा रिश्ता अटूट हैं पर क्या कभी हम गहराई से सोच पाते हैं कि पानी आया कहाँ से. कुछ साल पहले तक मैं भी यही सोचता था कि बारिश का पानी ज़मीन की गहराई में जाता हैं और हम बोरवेल बनवाकर पानी को धड़ाधड़ खींचते रहते हैं. सरकार से तो पानी की उम्मीद करना ही मज़ाक हैं. पर पानी की ये समझ सीमित हैं.इस बात का इल्म मुझे तब हुआ जब मैं एक दिन दिल्ली के एक बस स्टैंड पर उतरा. वहाँ ठन्डे पानी की मशीन लगाए 

एक लड़का चिल्ला-चिल्लाकर आवाज़ लगा रहा था कि "ताज़ा पानी पी लो और अपनी प्यास भुजा लो". 

मैंने पानी पीकर अपनी प्यास तो भुजाई पर एक जिज्ञासा भरा सवाल मेरे मन में हिचकौले मारने लगा. सवाल सीधा सा था कि आखिर शुद्ध और ताज़ा कहे जाने वाला पानी कितना पुराना होता हैं. मुझे लगा बारिश तो हर साल होती हैं तो 1 साल से पुराना क्या होगा? फिर लगा कि बादल पानी खुद से थोड़े ही बनाते हैं. बादलो में पानी की हर एक बूँद धरती पर मौजूद समंदर और कुछ हद तक पेड़-पौधे से होकर पहुँचती हैं. तो मतलब पानी की उम्र समुद्रों की उम्र जितनी हुई. जी हाँ. लगभग 380 करोड़ साल. पृथ्वी की उम्र लगभग 450 करोड़ साल हैं.  शुरूआती 70 करोड़ साल में पानी भांप के रूप में था बस. जैसे ही पृथ्वी ठंडी होने लगी भांप बारिश बनकर पृथ्वी की सतह पर टपकने लगी और समंदर बनते चले गए. कुछ वैज्ञानिक समझ ये भी हैं कि पृथ्वी के शुरूआती दिनों में हमारे सौर मंडल में मौजूद उल्का-पिंड पृथ्वी पर आ गिरे थे. वो पानी से भरे थे. उनके टकराने के बाद एक प्रक्रिया शुरू हुयी और समंदर पानी से भरते चले गए. कुछ का मानना हैं कि ज्वालामुखी और पृथ्वी की भीतरी सतहों में मौजूद पानी से भरे तत्वों की भी अहम् भूमिका रही पानी को अपने स्वरुप में आने में.    

वजह इन सबमे से कुछ भी हो पर ये बात लगभग 380 करोड़ साल पहले की ही हैं. तब से लेकर आज तक पानी सिर्फ चक्कर ही मार रहा हैं. इसी चकरी की वजह से बारिश के ज़रिये पानी हम तक तुरंत पहुंच जाता हैं और जल के भण्डार बनते चले जाते हैं - जैसे कि तालाब, नदियाँ और झीले. फिर अपनी जरूरतों के हिसाब से हम पानी में मिले गैर-ज़रूरी तत्वों को निकालकर इस्तेमाल कर लेते हैं.

एक बात और. पानी हमेशा समंदर से हम तक सीधे नहीं पहुँचता हैं, कभी-कभी ये वक़्त लाखों साल से भी ज्यादा का होता हैं. मिसाल के तौर पर हिमालय के पहाड़ो में लाखों सालो से हिमपात हो रहा हैं और ऊंचाई की वजह से वहाँ का तापमान भी कम होता हैं. इसकी वजह से हिमपात बर्फ की ढेर सारी नदियों (ग्लेशियर) में तब्दील होती चली गयी हैं. बढ़ते तापमान की वजह से वो बर्फ जो सालो साल संजोकर जमा हुई हैं वो पिघलने लगी हैं. ये पानी गंगा, इंदु और ब्रम्हपुत्र जैसी नदियों के ज़रिये आम लोगो तक पहुंचते रहता हैं.

तो मुद्दे की बात ये हुई कि पानी की हर एक बूँद, चाहे वो बोरवेल से होकर आपके नलों में आया हो या फिर नदियों में बह रहा हो, लगभग 380 करोड़ साल पुरानी हैं. हैं न दिलचस्प बात. 
 
 


पानी की बूंदे. सुयश रस्तोगी के सौजन्य से.

सौरभ विजय की कलम से

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