हमारे पड़ौसी गृह - शुक्र और मंगल

आज बात हमारे पड़ौसियों की. अरे नहीं, पड़ौस के शर्मा जी या फिर वर्मा जी की नहीं, बल्कि हमारी पृथ्वी के दो पड़ौसी गृह - मंगल (मार्स) और शुक्र (वीनस) की. आम तौर पर लोगों की बड़ी दिलचस्पी होती हैं अपने पड़ौसी की ज़िन्दगी में. मसलन पड़ौसी की बेटी का रिश्ता क्यों टूट गया या फिर पड़ौसी के बेटे की नौकरी अभी तक क्यों नहीं लगी. ऐसे गैर-ज़रूरती बातों में बड़ा रस आता हैं लोगों को. ये एक इंसानी फितरत हैं या फिर संस्कृति की देन, पर पता नहीं मुझे क्यों ये एक बिमारी जैसा लगता हैं. क्यूँकि मेरी नज़र में ऐसी जानकारी जुटाने से आपको हासिल कुछ भी नहीं होता हैं. ये बात और हैं कि कुछ लोगों के लिए ऐसी बातें समय काटने का एक मात्र ज़रिया होता हैं. मोहल्ले में गपशप बनी रहती हैं.

ऐसे लोगों के अलावा हर दौर में चंद इंसान ऐसे भी होते हैं जो कुछ ऐसा करते हैं जिससे कि पूरी इंसानी सभ्यता आगे बढ़ती हैं. मिसाल के तौर पर अमेरिका के एक छोटे से शहर (डेटन) में रहने वाले दो भाईयों ने सीमित संसाधनों से 1903 में पहला हवाई जहाज बनाकर उड़ा दिया. महज़ 100 सालों में हवाई यात्रा जो कभी दो भाईयों का एक सपना थी, आज दुनिया के किसी भी कोने का सफर तय करने का मुख्य ज़रिया हैं. वैज्ञानिक समुदाय और उनसे जुडी संस्थाओं की अहम् भूमिका होती हैं इंसानी सभ्यता को आगे धकेलने में. विज्ञान के ठोस सबूतों और तकनीकी विकास के ज़रिये पूरी सभ्यता की प्रगति होती हैं.

विज्ञान की एक शाखा हैं - अंतरिक्ष अनुसंधान. इस दिशा में काम करने वाली अंतरिक्ष संस्थाएं, जैसे की नासा, इसरो और यूरोपियन स्पेस एजेंसी, काफी प्रचलित भी हैं. मेरी समझ में अंतरिक्ष ही भविष्य हैं. अंतरिक्ष में असीमित संभावनाएं हैं. एक बुनियादी और अहम् सवाल तो यही हैं कि "क्या हम ब्रह्माण्ड में अकेले हैं या कोई और दूसरा भी हैं?" इस सवाल की खोज में बहुत से वैज्ञानिक प्रयोग हो रहे हैं और एक दिन जवाब जरूर मिलेगा. हमारे जीवन में सूरज और चाँद की तो अहम् भूमिका हैं ही. इसलिए ही उनके बारे में हम बहुत सी जानकारी जुटा चुके हैं. जानकारी जुटाने की होड़ भी और दौड़ भी हैं. मसलन चन्द्रमा 1950-1960 के दशक में अमेरिका और रूस के बीच अंतरिक्ष की दौड़ का प्रमुख बिन्दु था. दोनों देशो ने अनेको मिशन प्रक्षेपित किये और दौड़ तब ख़त्म हुयी जब नील आर्मस्ट्रांग ने अपना पहला कदम चन्द्रमा पर रखा. अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा की वो कामयाबी अद्वितीय थी, जिसने दूसरे देशो की अंतरिक्ष संस्थाओं को अंतरिक्ष की ओर कई रास्ते दिखा दिए.     

ऐसी ही दो और दिशाएँ हैं अंतरिक्ष में जिसमे हमारी बहुत रूचि हैं. सूरज से पृथ्वी का स्थान तीसरा हैं और हमारे पड़ौसी गृह शुक्र का दूसरा स्थान हैं जबकि मंगल गृह का स्थान चौथा हैं. चूंकि शुक्र और मंगल गृह हमारे करीब हैं, इनको खुली आँखों से भी देखा जा सकता हैं. अगर आपको सुबह 4-5 बजे सूर्योदय से पहले उठने में कोई दिक्कत नहीं हैं तो बाहर जाइये और देखिये, जो सबसे चमकता तारा हैं वो शुक्र ही हैं. मंगल गृह हर दो साल में पृथ्वी के करीब आता हैं. 2020 में भी ये पास आ गया हैं. अगस्त-सितम्बर में सूरज के ढलने के समय चाँद की दिशा में जो लाल तारा दिखता हैं वो मंगल गृह ही हैं. मैंने कुछ ही दिनों पहले देखा था.

शुक्र गृह सूरज के करीब होने की वजह से बहुत गर्म हैं. हमारी दुनिया में 35-40 डिग्री तापमान होने पर ज़्यादातर लोगो के पसीने छूट जाते हैं और शुक्र का तापमान तो 465 डिग्री हैं. सुनकर ही दिमाग से भाप निकलने लगती हैं. मंगल गृह इसके बिलकुल उलट एक ठंडी जगह हैं. ठण्ड में मंगल का तापमान -60 डिग्री हो जाता हैं और गर्मियों के दिनों में 20 डिग्री. ये बात सुनकर तो ऐसा लग रहा होगा कि मार्स पर रहना तो इतना मुश्किल नहीं हैं. यूरोप और अमेरिका के बहुत से शहरों का भी तो यही हाल होता हैं. एक-दो जैकेट ज़्यादा पहननी पड़ती हैं बस. काश सब कुछ इतना आसान होता. मंगल गृह पर वायुमंडल न के बराबर हैं. मतलब जैसे ही हम अगर मंगल गृह पर कदम रखेंगे, फटकर भांप बनकर गायब हो जायेंगे. जीवन-दायनी ऑक्सीजन भी नहीं हैं वहाँ. और तो और कार्बन-डाई-ऑक्साइड (CO2) भी भर-भरकर हैं. नासा ने मार्स पर एक 4 पहिये की गाडी भेजी हैं जो घूमंतु की तरह उसकी सतह पर डोल रहा हैं. एक दिन उसने मार्स की सतह को एकाएक खोदा और क्या निकला? बर्फ. मतलब पानी भी भारी मात्रा में हैं मार्स पर किन्तु जमा हुआ हैं. बहुत सी संभावनाएं हैं मार्स पर इंसानी बस्ती को बसाने के लिए. अंतरिक्ष की खोज में ये एक अहम् कदम होगा. अमेरिका की एक निजी अंतरिक्ष कंपनी स्पेस-एक्स ने 2030 तक मार्स पर पहली इंसानी बस्ती को बसाने का बेडा उठाया हैं. नासा भी उसके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर काम कर रहा हैं. मार्स को पूरी तरह से हमारे लायक बनाने के लिए री -इंजीनियर करना होगा बस. एक कदम तो ये हैं कि मार्स पर ग्लोबल वार्मिंग जैसी स्तिथी पैदा करनी होगी. जिससे वहाँ की बर्फ पिघलना शुरू हो जाएगी और वायुमंडल सघन होता जाएगा. वैज्ञानिकों के पास ऐसे ही 5-6 और कदम हैं जिससे मार्स को पृथ्वी जैसा बनाया जा सकता हैं. वक़्त लगेगा पर मुमकिन हैं.

क्या कोई शुक्र गृह पर भी इंसानी बस्ती बनाने की सोच सकता हैं? जी हाँ. नासा का एक मिशन हैं - हवोक, जिसके तहत शुक्र की सतह से 50 किलोमीटर ऊपर हवा में लटकी हुयी इंसानी बस्ती बनाने की योजना हैं. कुछ लोग सोच सकते हैं कि ऐसे लटके हुए रहने में भी कोई बात हुई भला. हमारी दुनिया के बड़े शहरों में कितने ही लोग ऐसे हैं जो लटके ही हुए हैं. मसलन दुबई शहर की बुर्ज खलीफा ईमारत 160 मंजिला हैं और उसकी ऊंचाई लगभग 1 किलोमीटर हैं. ऐसे में वहाँ रहने वाला हर शक़्स सतह से बहुत ऊंचाई पर ही हैं. मंगल की तुलना में शुक्र गृह पृथ्वी के पास भी हैं. जहां मंगल पहुंचने में 9 महीने का वक़्त लग सकता हैं वहीं शुक्र गृह 6 महीने में ही पंहुचा जा सकता हैं. आने वाले 30 सालों में मंगल और शुक्र पर इंसानी बस्ती तो बन ही जाएगी अगर इंसान पृथ्वी पर ज़िंदा रहे तो.    

कुछ लोग ये भी सोच सकते हैं कि पृथ्वी का तो हमने क्या हाल कर दिया हैं और अब चले हैं दूसरी दुनिया बसाने. सवाल तो वाजिब हैं पर मेरी नज़र में ये दो अलग बातें हैं. एक तरफ हमें पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन के लिए अभी ही ठोस कदम उठाने होंगे. ख़ास तौर पर देश की सरकारों को. दूसरी तरफ अंतरिक्ष की अंतहीन यात्रा पर हमे निरंतर चलते रहना होगा.   

सौरभ विजय की कलम से

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